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हिंदी व्याकरण

Hindi Grammar – Hindi Vyakaran – हिंदी व्याकरण

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According to me, millions of students are searching Hindi Grammar or Hindi Vyakaran for class 12 to 6 as well as the competitive exam. I am not sure to finds each topic with video on a single page. It is very difficult to write Hindi Grammar on one page. I just write the sort summary of each topic with Video. If you are also a student and looking for Hindi Vyakaran then you should view my video by Topics. If you have any queries related to Hindi Grammar then you can easily ask through a comment box.

मेरे अनुसार, लाखों छात्र-छात्रा जो कक्षा ६ से १२ पढ़ रहे है या फिर जो प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे है, वो सरे विद्यार्थी हिंदी व्याकरण खोज रहे हैं। ऐसी बजह से हमने एक पृष्ठ पर सभी चैप्टर के संक्षिप्त के साथ वीडियो रखे है जिससे विधार्थी को आसानी से वीडियो देख कर समझ जाय। यदि आपके पास हिंदी व्याकरण से संबंधित कोई प्रश्न है तो आप कमेंट बॉक्स के माध्यम से आसानी से पूछ सकते हैं।

Varnmala In Hindi Grammar

वर्ण – भाषा की सार्थक इकाई वाक्य हैं। वाक्य से छोटी इकाई उपवाक्य , उपवाक्य से छोटी इकाई पदबंध , पदबंध से छोटी इकाई पद , पद से छोटी इकाई अक्षर और अक्षर से छोटी इकाई ध्वनि होती है ध्वनि को वर्ण भी कहते हैं।
वर्णमाला– हिंदी भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि होती है। इसी ध्वनि को ही वर्ण कहा जाता है। वर्णों को व्यवस्थित करने के समूह को वर्णमाला कहते हैं।

  • हिंदी में उच्चारण के आधार पर 45 वर्ण होते हैं। इनमें 10 स्वर और 35 व्यंजन होते हैं।
  • लेखन के आधार पर 52 वर्ण होते हैं इसमें 13 स्वर , 35 व्यंजन तथा 4 संयुक्त व्यंजन होते हैं।

वर्णमाला के दो भाग होते हैं :-

  1. स्वर – जिन वर्णों को स्वतंत्र रूप से बोला जा सके उसे स्वर कहते हैं। परम्परागत रूप से स्वरों की संख्या 13 मानी गई है लेकिन उच्चारण की दृष्टि से 10 ही स्वर होते हैं।
    • उच्चारण के आधार पर स्वर :- अ, आ , इ , ई , उ , ऊ , ए , ऐ , ओ , औ आदि।
    • लेखन के आधार पर स्वर :-अ, आ, इ , ई , उ , ऊ , ए , ऐ , ओ , औ , अं , अ: , ऋ आदि।
  2. व्यंजन – जो वर्ण स्वरों की सहायता से बोले जाते हैं उन्हें व्यंजन कहते हैं। हर व्यंजन के उच्चारण में अ स्वर लगा होता है। अ के बिना व्यंजन का उच्चारण नहीं हो सकता। वर्णमाला में कुल 35 व्यंजन होते हैं।
    • कवर्ग : क , ख , ग , घ , ङ
    • चवर्ग : च , छ , ज , झ , ञ
    • टवर्ग : ट , ठ , ड , ढ , ण ( ड़ ढ़ )
    • तवर्ग : त , थ , द , ध , न
    • पवर्ग : प , फ , ब , भ , म
    • अंतस्थ : य , र , ल , व्
    • उष्म : श , ष , स , ह
    • संयुक्त व्यंजन : क्ष , त्र , ज्ञ , श्र

Sangya Hindi Grammar

संज्ञा उस विकारी शब्द को कहते है, जिससे किसी विशेष वस्तु, भाव और जीव के नाम का बोध हो, उसे संज्ञा कहते है।
दूसरे शब्दों में– किसी प्राणी, वस्तु, स्थान, गुण या भाव के नाम को संज्ञा कहते है।

संज्ञा कितने प्रकार के होते है।
मुख्यतः ये तीन प्रकार की ही संज्ञा होती हैं परंतु जातिवाचक संज्ञा के दो और प्रकार होते हैं जिसकी वजह से संज्ञा के दो प्रकार और बढ़ जाते हैं और इसके पांच प्रकार के होते हैं।

  1. व्यक्तिवाचक (Proper noun) – जिस शब्द से किसी एक वस्तु या व्यक्ति का बोध होता है, उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे – रमेश, महेश, गंगा, हिमालय।
  2. जातिवाचक (Common noun) – जिस शब्द से एक ही प्रकार की वस्तुओं, व्यक्तियों तथा प्रवृत्तियों का बोध हो तो उसे जातिवाचक संज्ञा कहते हैं। संबंधियों, व्यवसायों, पदों तथा कार्यो, पशु-पक्षियों, वस्तुओं तथा प्राकृतिक तत्वों के नाम जातिवाचक संज्ञा के अंतर्गत आते हैं।
  3. भाववाचक (Abstract noun) – जिस शब्द से किसी व्यक्ति या वस्तु के गुण या धर्म, दशा तथा कार्य व्यापार का बोध होता है, उसे भाववाचक संज्ञा कहते हैं।
  4. समूहवाचक (Collective noun) – जिस शब्द से वस्तु अथवा व्यक्ति के समूह अथवा बहुलता का बोध हो उसे समूहवाचक संज्ञा कहते है। सभा, दाल, संघ, गुच्छा, कुंज इत्यादि शब्द समूह का बोध कराते हैं।
  5. द्रव्यवाचक (Material noun)– जिस शब्द से किसी धातु, द्रव तथा ऐसी वस्तुओं, जिसे नापा-तौला जा सके, का बोध हो, द्रव्यवाचक संज्ञा कहलाती है।

Karak Hindi Grammar

कारक का अर्थ होता है किसी कार्य को करने वाला। यानी जो भी क्रिया को करने में भूमिका निभाता है, वह कारक कहलाता है।
कारक के भेद 

  1. कर्ता कारक: जो वाक्य में कार्य को करता है, वह कर्ता कहलाता है। कर्ता वाक्य का वह रूप होता अहि जिसमे कार्य को करने वाले का पता चलता है।
  2. कर्म कारक: वह वस्तु या व्यक्ति जिस पर वाक्य में की गयी क्रिया का प्रभाव पड़ता है वह कर्म कहलाता है।
  3. करण कारक: वह साधन जिससे क्रिया होती है, वह करण कहलाता है। यानि, जिसकी सहायता से किसी काम को अंजाम दिया जाता वह करण कारक कहलाता है।
  4. सम्प्रदान कारक: सम्प्रदान का अर्थ ‘देना’ होता है। जब वाक्य में किसी को कुछ दिया जाए या किसी के लिए कुछ किया जाए तो वहां पर सम्प्रदान कारक होता है।
  5. अपादान कारक: जब संज्ञा या सर्वनाम के किसी रूप से किन्हीं दो वस्तुओं के अलग होने का बोध होता है, तब वहां अपादान कारक होता है।
  6. संबंध कारक: संज्ञा या सर्वनाम का वह रूप जो हमें किन्हीं दो वस्तुओं के बीच संबंध का बोध कराता है, वह संबंध कारक कहलाता है।
  7. अधिकरण कारक: संज्ञा का वह रूप जिससे क्रिया के आधार का बोध हो उसे अधिकरण कारक कहते हैं।
  8. संबोधन कारक: संज्ञा या सर्वनाम का वह रूप जिससे किसी को बुलाने, पुकारने या बोलने का बोध होता है, तो वह सम्बोधन कारक कहलाता है।

Kriya Visheshan Hindi Grammar

क्रिया विशेषण – वह शब्द जो हमें क्रियाओं की विशेषता का बोध कराते हैं वे शब्द क्रिया विशेषण कहलाते हैं।

अर्थ के आधार पर क्रिया विशेषण के भेद:

  1. कालवाचक क्रियाविशेषण: वो क्रियाविशेषण शब्द जो क्रिया के होने के समय के बारे में बताते हैं, कालवाचक क्रियाविशेषण कहलाते हैं।
  2. रीतिवाचक क्रियाविशेषण: ऐसे क्रियाविशेषण शब्द जो किसी क्रिया के होने की विधि या तरीके का बोध कराते हैं, वह शब्द रीतिवाचक क्रिया विशेषण कहलाते हैं।
  3. स्थानवाचक क्रियाविशेषण : ऐसे अविकारी शब्द जो हमें क्रियाओं के होने के स्थान का बोध कराते हैं, वे शब्द स्थानवाचक क्रियाविशेषण कहलाते हैं।
  4. परिमाणवाचक क्रियाविशेषण: ऐसे क्रियाविशेषण शब्द जिनसे हमें क्रिया के परिमाण, संख्या या मात्र का पता चलता है, वे शब्द परिमाणवाचक क्रियाविशेषण कहलाते हैं।

प्रयोग के आधार पर क्रियाविशेषण के भेद

  1. साधारण क्रियाविशेषण: ऐसे क्रियाविशेषण शब्द जिनका प्रयोग वाक्य में स्वतंत्र होता है, वे शब्द साधारण क्रियाविशेषण कहलाते हैं।
  2. सयोंजक क्रियाविशेषण: जिन क्रियाविशेषणों का सम्बन्ध किसी उपवाक्य से होता है , वह शब्द सयोंजक क्रियाविशेषण कहलाते हैं।
  3. अनुबद्ध क्रियाविशेषण: ऐसे शब्द जो निश्चय के लिए कहीं भी प्रयोग कर लिए जाते हैं वे शब्द अनुबद्ध क्रियाविशेषण कहलाते हैं।

रूप के आधार पर क्रियाविशेषण के भेद

  1. मूल क्रियाविशेषण: ऐसे शब्द जो दुसरे शब्दों के मेल से नहीं बनते यानी जो दुसरे शब्दों में प्रत्यय लगे बिना बन जाते हैं, वे शब्द मूल क्रियाविशेषण कहलाते हैं।
  2. स्थानीय क्रियाविशेषण: ऐसे अन्य शब्द-भेद जो बिना अपने रूप में बदलाव किये किसी विशेष स्थान पर आते हैं, वे स्थानीय क्रियाविशेषण कहलाते हैं।
  3. योगिक क्रियाविशेषण: ऐसे क्रियाविशेषण जो किसी दुसरे शब्दों में प्रत्यय या पद आदि लगाने से बनते हैं, ऐसे क्रियाविशेषण योगिक क्रियाविशेषणों की श्रेणी में आते हैं।

Vakya Hindi Grammar

वाक्य– दो या दो से अधिक पदों के सार्थक समूह को, जिसका पूरा पूरा अर्थ निकलता है, वाक्य कहते हैं।

वाक्यांश – शब्दों के ऐसे समूह को जिसका अर्थ तो निकलता है किन्तु पूरा पूरा अर्थ नहीं निकलता, वाक्यांश कहते हैं।

रचना के आधार पर वाक्य के तीन भेद होते हैं:

  1. सरल वाक्य – ऐसा वाक्य जिसमे एक ही क्रिया एवं एक ही कर्ता होता है या जिस वाक्य में एक ही उद्देश्य एवं एक ही विधेय होता है, वे वाक्य सरल वाक्य कहलाते हैं।
  2. सयुंक्त वाक्य – ऐसा वाक्य जिसमे दो या दो से अधिक उपवाक्य हो एवं सभी उपवाक्य प्रधान हों, ऐसे वाक्य को सयुंक्त वाक्य कहते हैं।
  3. मिश्रित/ मिश्र वाक्य – ऐसे वाक्य जिनमें सरल वाक्य के साथ-साथ कोई दूसरा उपवाक्य भी हो, वे वाक्य मिश्र वाक्य कहलाते हैं।

अर्थ के आधार पर वाक्य के आठ भेद होते हैं:

  1. विधानवाचक वाक्य – ऐसे वाक्य जिनसे किसी काम के होने या किसी के अस्तित्व का बोध हो, वह वाक्य विधानवाचक वाक्य कहलाता है।
  2. इच्छावाचक वाक्य – ऐसे वाक्य जिनसे हमें वक्ता की कोई इच्छा, कामना, आकांशा, आशीर्वाद आदि का बोध हो, वह वाक्य इच्छावाचक वाक्य कहलाते हैं।
  3. आज्ञावाचक वाक्य – ऐसे वाक्य जिनमें आदेश, आज्ञा या अनुमति का पता चले या बोध हो, वे वाक्य आज्ञावाचक वाक्य कहलाते हैं।
  4. निषेधवाचक वाक्य – जिन वाक्यों से कार्य के निषेध का बोध होता है, वह वाक्य निषेधवाचक वाक्य कहलाते हैं।
  5. प्रश्नवाचक वाक्य – जिन वाक्योँ मेँ कोई प्रश्न किया जाये या किसी से कोई बात पूछी जाये, उन्हेँ प्रश्नवाचक वाक्य कहते हैँ।
  6. विस्मयादिबोधक वाक्य – ऐसे वाक्य जिनमे हमें आश्चर्य, शोक, घृणा, अत्यधिक ख़ुशी, स्तब्धता आदि भावों का बोध हो, ऐसे वाक्य विस्मयादिबोधक वाक्य कहलाते हैं।
  7. संकेतवाचक वाक्य – वे वाक्य जिनसे हमें एक क्रिया का दूसरी क्रिया पर निर्भर होने का बोध हो, ऐसे वाक्य संकेतवाचक वाक्य कहलाते हैं।
  8. संदेहवाचक वाक्य – ऐसे वाक्य जिनसे हमें किसी प्रकार के संदेह या संभावना का बोध होता है, वह वाक्य संदेहवाचक वाक्य कहलाते हैं।

Samas Hindi Grammar

समास का तात्पर्य होता है – संछिप्तीकरण। जहाँ पर कम-से-कम शब्दों में अधिक से अधिक अर्थ को प्रकट किया जाए वह समास कहलाता है।

समास के भेद :

  1. अव्ययीभाव समास– जिस समास में पूर्वपद अव्यय हो, अव्ययीभाव समास कहलाता है। यह वाक्य में क्रिया-विशेषण का कार्य करता है;
  2. तत्पुरुष समास – जिस समास में पूर्वपद गौण तथा उत्तरपद प्रधान हो, तत्पुरुष समास कहलाता है।
  3. कर्मधारय समास – जिस समास में पूर्वपद विशेषण और उत्तरपद विशेष्य हो, कर्मधारय समास कहलाता है। इसमें भी उत्तरपद प्रधान होता है;
  4. द्विगु समास – जिस समास में पूर्वपद संख्यावाचक हो, द्विगु समास कहलाता है।
  5. द्वंद्व समास – जिस समास में पूर्वपद और उत्तरपद दोनों ही प्रधान हों अर्थात् अर्थ की दृष्टि से दोनों का स्वतन्त्र अस्तित्व हो और उनके मध्य संयोजक शब्द का लोप हो तो द्वन्द्व समास कहलाता है;
  6. बहुब्रीहि समास – जिस समास में दोनों पदों के माध्यम से एक विशेष (तीसरे) अर्थ का बोध होता है, बहुव्रीहि समास कहलाता है;

Sarvanam Hindi Grammar

सर्वनाम – संज्ञा के स्थान पर आने वाले शब्दों को सर्वनाम कहते हैं।

सर्वनाम के छ: भेद होते हैं –

  1. पुरुषवाचक सर्वनाम – जिन सर्वनाम शब्दों का प्रयोग वक्ता द्वारा खुद के लिए या दुसरो के लिए किया जाता है, उसे पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं।
  2. निजवाचक सर्वनाम – जिन शब्दों का प्रयोग वक्ता किसी चीज़ को अपने साथ दर्शाने या अपनी बताने के लिए करता है, वे निजवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।
  3. निश्चयवाचक सर्वनाम – जिन सर्वनाम शब्दों से किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थान की निश्चितता का बोध हो वे शब्द निश्चयवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।
  4. अनिश्चयवाचक सर्वनाम – जिन सर्वनाम शब्दों से वस्तु, व्यक्ति, स्थान आदि की निश्चितता का बोध नही होता वे अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।
  5. प्रश्नवाचक सर्वनाम – जिन शब्दों का प्रयोग किसी वस्तु, व्यक्ति आदि के बारे में कोई सवाल पूछने या उसके बारे में जान्ने के लिए किया जाता है उन शब्दों को प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते हैं।
  6. सम्बन्धवाचक सर्वनाम – जिन सर्वनाम शब्दों का प्रयोग किसी वस्तु या व्यक्ति का सम्बन्ध बताने के लिए किया जाए वे शब्द सम्बन्धवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।

Vachan Hindi Grammar

वचन – शब्द के जिस रूप से एक या एक से अधिक का बोध होता है, उसे हिन्दी व्याकरण में ‘वचन’ कहते है।

वचन के दो भेद होते हैं:

1. एकवचन: संज्ञा के जिस रूप से एक व्यक्ति या एक वस्तु होने का ज्ञान हो, उसे एकवचन कहते है अर्थात जिस शब्द के कारण हमें किसी व्यक्ति, वस्तु, प्राणी, पदार्थ आदि के एक होने का पता चलता है उसे एकवचन कहते हैं।

जैसे :- लड़का, लडकी, गाय, सिपाही, बच्चा, कपड़ा, माता, पिता, माला, पुस्तक, स्त्री, टोपी, बन्दर, मोर, बेटी, घोडा, नदी, कमरा, घड़ी, घर, पर्वत, मैं, वह, यह, रुपया, बकरी, गाड़ी, माली, अध्यापक, केला, चिड़िया, संतरा, गमला, तोता, चूहा आदि।

2. बहुवचन: शब्द के जिस रूप से एक से अधिक व्यक्ति या वस्तु होने का ज्ञान हो, उसे बहुवचन कहते है अर्थात जिस शब्द के कारण हमें किसी व्यक्ति, वस्तु, प्राणी, पदार्थ आदि के एक से अधिक या अनेक होने का पता चलता है उसे बहुवचन कहते हैं।

जैसे :- लडके, लडकियाँ, गायें, कपड़े, टोपियाँ, मालाएँ, माताएँ, पुस्तकें, वधुएँ, गुरुजन, रोटियां, पेंसिलें, स्त्रियाँ, बेटे, बेटियाँ, केले, गमले, चूहे, तोते, घोड़े, घरों, पर्वतों, नदियों, हम, वे, ये, लताएँ, गाड़ियाँ, बकरियां, रुपए आदि

Sandhi Hindi Grammar

संधि – दो वर्णों के मेल से होने वाले विकार को संधि कहते हैं।

संधि के मुख्यतः तीन भेद होते हैं :

1). स्वर संधि – दो स्वरों से उत्पत्र विकार अथवा रूप-परिवर्तन को स्वर संधि कहते है।

स्वर संधि के भेद:
A). दीर्घ संधि – जब दो सवर्ण, ह्रस्व या दीर्घ, स्वरों का मेल होता है तो वे दीर्घ सवर्ण स्वर बन जाते हैं। इसे दीर्घ स्वर-संधि कहते हैं।
B). गुण संधि – अ, आ के साथ इ, ई का मेल होने पर ‘ए’; उ, ऊ का मेल होने पर ‘ओ’; तथा ऋ का मेल होने पर ‘अर्’ हो जाने का नाम गुण संधि है।
C). वृद्धि संधि – अ, आ का मेल ए, ऐ के साथ होने से ‘ऐ’ तथा ओ, औ के साथ होने से ‘औ’ में परिवर्तन को वृद्धि संधि कहते हैं।
D). यण संधि – इ, ई, उ, ऊ या ऋ का मेल यदि असमान स्वर से होता है तो इ, ई को ‘य’; उ, ऊ को ‘व’ और ऋ को ‘र’ हो जाता है। इसे यण संधि कहते हैं।
E). अयादि संधि – ए, ऐ तथा ओ, औ का मेल किसी अन्य स्वर के साथ होने से क्रमशः अय्, आय् तथा अव्, आव् होने को अयादि संधि कहते हैं।

2). व्यंजन संधि – व्यंजन से स्वर अथवा व्यंजन के मेल से उत्पत्र विकार को व्यंजन संधि कहते है।

3). विसर्ग संधि – विसर्ग के साथ स्वर या व्यंजन मेल से जो विकार होता है, उसे ‘विसर्ग संधि’ कहते है।

Vachya Hindi Grammar

वाच्य क्रिया का वह रूप है, जिससे यह ज्ञात होता है कि वाक्य में कर्ता प्रधान है या कर्म अथवा भाव। क्रिया के लिंग एवं वचन उसी के अनुरूप होते हैं।

वाच्य के तीन प्रकार हैं-

  1. कर्तृवाच्य – कर्तृवाच्य का मुख्य बिंदु कर्ता होता है। क्रिया के लिंग तथा वचन कर्ता के लिंग और वचन के अनुसार ही होते हैं।
  2. कर्मवाच्य – जहाँ क्रिया का संबंध सीधा कर्म से हो तथा क्रिया का लिंग तथा वचन कर्म के अनुसार हो, उसे कर्म वाच्य कहते हैं।
  3. भाववाच्य -जहाँ कर्ता और कर्म की नहीं बल्कि भाव की प्रधानता हो, उस वाक्य को भाव वाच्य कहते हैं।

Upsarg Hindi Grammar

उपसर्ग उस शब्दांश या अव्यय को कहते है, जो किसी शब्द के पहले आकर उसका विशेष अर्थ प्रकट करता है।

दूसरे शब्दों में– ”उपसर्ग वह शब्दांश या अव्यय है, जो किसी शब्द के आरंभ में जुड़कर उसके अर्थ में (मूल शब्द के अर्थ में) विशेषता ला दे या उसका अर्थ ही बदल दे।” वे उपसर्ग कहलाते है।

जैसे– प्रसिद्ध, अभिमान, विनाश, उपकार। इनमे कमशः ‘प्र’, ‘अभि’, ‘वि’ और ‘उप’ उपसर्ग है।

हिंदी में प्रचलित उपसर्गो को निम्नलिखित भागो में विभाजित किया जा सकता है-

  1. संस्कृत के उपसर्ग
  2. हिंदी के उपसर्ग
  3. उर्दू के उपसर्ग
  4. अंग्रेजी के उपसर्ग
  5. उपसर्गवत् अव्यय, संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण

Kaal Hindi Grammar

काल – जिस रूप से क्रिया के होने के समय का बोध हो, उसे काल कहते हैं।

काल के तीन भेद होते है –

  1. वर्तमान काल (present Tense) – जो समय चल रहा है।
  2. भूतकाल(Past Tense) – जो समय बीत चुका है।
  3. भविष्यत काल (Future Tense)– जो समय आने वाला है।

A. भूतकाल– क्रिया के जिस रूप से यह पता चले कि काम बीते हुए समय में पूरा हो गया है।

  1. सामान्य भूतकाल – जिससे भूतकाल की क्रिया के विशेष समय का ज्ञान न हो, उसे सामान्य भूतकाल कहते हैं।
  2. आसन भूतकाल – क्रिया के जिस रूप से यह पता चले कि क्रिया अभी कुछ समय पहले ही पूर्ण हुई है, उसे आसन्न भूतकाल कहते हैं।
  3. पूर्ण भूतकाल – क्रिया के उस रूप को पूर्ण भूत कहते है, जिससे क्रिया की समाप्ति के समय का स्पष्ट बोध होता है कि क्रिया को समाप्त हुए काफी समय बीता है।
  4. अपूर्ण भूतकाल -जिस क्रिया से यह ज्ञात हो कि भूतकाल में कार्य सम्पन्न नहीं हुआ था – अभी चल रहा था, उसे अपूर्ण भूत कहते हैं।
  5. संदिग्ध भूतकाल – भूतकाल की जिस क्रिया से कार्य होने में अनिश्चितता अथवा संदेह प्रकट हो, उसे संदिग्ध भूतकाल कहते है।
  6. हेतुहेतुमद् भूत – यदि भूतकाल में एक क्रिया के होने या न होने पर दूसरी क्रिया का होना या न होना निर्भर करता है, तो वह हेतुहेतुमद् भूतकाल क्रिया कहलाती है।

B. वर्तमानकाल – क्रिया के जिस रूप से वर्तमान में चल रहे समय का बोध होता है, उसे वर्तमान काल कहते है।

  1. सामान्य वर्तमानकाल – क्रिया का वह रूप जिससे क्रिया का वर्तमानकाल में होना पाया जाय, ‘सामान्य वर्तमानकाल’ कहलाता है।
  2. अपूर्ण वर्तमानकाल – क्रिया के जिस रूप से यह बोध हो कि वर्तमान काल में कार्य अभी पूर्ण नहीं हुआ, वह चल रहा है, उसे अपूर्ण वर्तमान कहते हैं।
  3. पूर्ण वर्तमानकाल – इससे वर्तमानकाल में कार्य की पूर्ण सिद्धि का बोध होता है।
  4. संदिग्ध वर्तमानकाल – जिससे क्रिया के होने में सन्देह प्रकट हो, पर उसकी वर्तमानकाल में सन्देह न हो। उसे संदिग्ध वर्तमानकाल कहते हैं।
  5. तत्कालिक वर्तमानकाल – क्रिया के जिस रूप से यह पता चलता है कि कार्य वर्तमानकाल में हो रही है उसे तात्कालिक वर्तमानकाल कहते हैं।
  6. संभाव्य वर्तमानकाल – इससे वर्तमानकाल में काम के पूरा होने की सम्भवना रहती है। उसे सम्भाव्य वर्तमानकाल कहते हैं।

C. भविष्यतकाल – भविष्य में होने वाली क्रिया को भविष्यत काल की क्रिया कहते हैं।

  1. सामान्य भविष्यत काल – क्रिया के जिस रूप से उसके भविष्य में सामान्य ढंग से होने का पता चलता है, उसे सामान्य भविष्यत काल कहते हैं।
  2. सम्भाव्य भविष्यत काल – क्रिया के जिस रूप से उसके भविष्य में होने की संभावना का पता चलता है, उसे सम्भाव्य भविष्यत काल कहते हैं।
  3. हेतुहेतुमद्भविष्य भविष्यत काल – क्रिया के जिस रूप से एक कार्य का पूरा होना दूसरी आने वाले समय की क्रिया पर निर्भर हो उसे हेतुहेतुमद्भविष्य भविष्य काल कहते है।

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